Daily home-based meditation can increase the amount of grey matter in brains of patients with mild Alzheimer’s disease: Study

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A recent study by Indian researchers has shown that a six-month daily home-based meditation can increase the amount of grey matter in brains of patients with mild cognitive impairment (MCI) or those with mild Alzheimer’s disease.  Meditation, therefore, appears to have a protective effect on the brain in these patients.

Persons with MCI are forgetful but can lead independent lives.  However, they have a higher risk of developing Alzheimer’s disease.  Alzheimer’s disease is progressive and irreversible and a major global health problem with huge socioeconomic implications. Yet, except for one prohibitively costly drug that is still being evaluated for clinical benefit, no medicine can alter the disease progression nor prevent or delay its conversion from the stage of MCI.  

A research supported under the SATYAM program by Department of Science & Technology, Govt. of India was led by Dr. Amitabha Ghosh Director and Head Department of Neurology, Apollo Multispecialty Hospital Kolkata (erstwhile Apollo Gleneagles Hospital) together with Dr. S Bapi Raju {Cognitive Science lab at IIIT Hyderabad}, in collaboration with other researchers shows that a simple, cheap, easy to follow, meditation routine, when practiced daily for several months, can reverse grey matter loss in MCI and even in mild Alzheimer’s disease. This work has been published in the journal ‘Frontiers in Human Neuroscience’.

For this work, the researchers allocated patients with MCI or mild Alzheimer’s disease to meditation or control groups.  The meditation group practiced 30 minutes of silent, sitting meditation daily for 6 months. They did MRI scans at baseline and after 6 months, and all patients also underwent neuropsychological assessment.  The meditation group showed significantly increased grey matter over the frontal brain regions that are responsible for control of attention and goal-directed decision-making and reduced grey matter posteriorly. The left hippocampus (memory) and the right thalamus also showed an increase in grey matter volume. The team found a trend towards improved attention among the meditators.

According to the researchers, meditation research in MCI and Alzheimer’s disease is still very young. Previous researchers combined meditation with physical postures, movements, mantras, kriyas, or other mindfulness practices. Home meditation practice typically lasted 8-12 weeks.  Studies where it did extend for longer, did not include brain changes.  This is one of the first on brain changes in MCI and Alzheimer’s disease that explores the effects of silent, sitting meditation alone, practiced daily over a long term. The techniques are similar to those commonly practiced by regular meditation practitioners yet simplified enough to train a patient with early memory loss.

“Much of our waking state is spent on mind wandering. Excessive mind wandering, especially when loaded with persistent negative thoughts, damage the brain, predisposing one to early aging or even Alzheimer’s disease.  Meditation teaches non-judgmental and non-reactive awareness of appearing thoughts and improves one's ability to disengage and focus on intended goals.  By doing so, meditation activates a set of brain networks which co-ordinate to increase attention and goal-directed behaviour, and reduce mind wandering and emotional reactivity,” Dr. Amitabha Ghosh explains.

This research suggests that spending a little time everyday on meditation practice could be protective in patients with memory loss.  It is possible that the earlier one starts practicing meditation, the better will be the results. The team plans to follow up on this work with much larger participant numbers and longer durations of study.

For more details, Amitabha Ghosh (amitabhaghosh269@gmail.com) can be contacted.

घर पर किया गया दैनिक ध्यान हल्के स्मृति ह्रास (अल्जाइमर) रोग वाले रोगियों के मष्तिष्क में बुद्धिमत्ता वाले धूसर द्रव्य (ग्रे मैटर) की मात्रा बढ़ा सकता है: एक अध्ययन

भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि छह महीने तक किया गया दैनिक घरेलू ध्यान हल्की संज्ञानात्मक हानि

(एमसीआई) अथवा हल्के स्मृति ह्रास (अल्जाइमर) रोग वाले रोगियों के मष्तिष्क  में बुद्धिमत्ता वाले धूसर द्रव्य (ग्रे मैटर) की मात्रा को बढ़ा सकता है। इसलिए, ऐसे  रोगियों द्वारा ध्यान किए जाने का मस्तिष्क पर सुरक्षात्मक प्रभाव पड़ता है ।

हल्की संज्ञानात्मक हानि (एमसीआई) वाले व्यक्ति अक्सर भुलक्कड़ होते हैं लेकिन वे स्वतंत्र जीवन जी सकते हैं। हालांकि, ऐसे व्यक्तियों में स्मृति ह्रास (अल्जाइमर) रोग विकसित होने का अधिक खतरा होता है। एक बार होने के बाद अल्जाइमर रोग बढ़ता ही है फिर ठीक कम ही होता है और इस प्रकार यह एक प्रमुख वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है जिसका व्यापक सामाजिक आर्थिक प्रभाव पड़ता है। फिर भी, एक निषेधात्मक रूप से महंगी दवा को छोड़कर, जिसका अभी भी नैदानिक ​​लाभ के लिए मूल्यांकन किया जा रहा है, कोई भी दवा इस रोग की प्रगति को और बढने से रोक  नहीं सकती है और न ही एमसीआई के चरण से इसके रूपांतरण को रोक या विलंबित कर सकती है ।

भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा सत्यम (एसएटीवाईएम) कार्यक्रम के तहत समर्थित एक शोध में अपोलो मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, कोलकाता में तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोलॉजी) विभाग के प्रमुख और निदेशक डॉ अमिताभ घोष के नेतृत्व में (पूर्व में अपोलो ग्लेनीगल्स अस्पताल) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद में संज्ञानात्मक विज्ञान प्रयोगशाला   (कॉग्निटिव साइंस लैब) के डॉ एस बापी राजू और अन्य के साथ मिलकर अन्य शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किए सहयोग से यह दिखाया है कि एक सरल, सस्ती और पालन करने में आसान, ध्यान दिनचर्या को जब कई महीनों तक दैनिक अभ्यास के रूप में अपनाया जाता है तब हल्की  संज्ञानात्मक हानि

(एमसीआई) और यहां तक ​​कि हल्के अल्जाइमर रोग में भी यह प्रक्रिया ग्रे मैटर की हो रही हानि को उलट सकती है। यह शोध कार्य 'फ्रंटियर्स इन ह्यूमन न्यूरोसाइंस' जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

इस कार्य के लिए, शोधकर्ताओं ने तब हल्की संज्ञानात्मक हानि (एमसीआई) या हल्के अल्जाइमर रोग वाले रोगियों को ध्यान या नियंत्रण समूहों में विभक्त किया। इस प्रकार बनाए गए ध्यान समूहों ने 6 महीने तक प्रतिदिन 30 मिनट बैठकर मौन रहते हुए ध्यान का अभ्यास किया। उन्होंने बेसलाइन पर और 6 महीने के बाद सभी रोगियों की एमआरआई स्कैनिंग कीI साथ ही सभी रोगियों का तंत्रिका मनोवैज्ञानिक (न्यूरोसाइकोलॉजिकल) मूल्यांकन भी हुआ। इन ध्यान समूहों ने ललाट मस्तिष्क क्षेत्रों में बहुत अधिक मात्रा बढ़े हुए उस ग्रे पदार्थ को दिखाया जो ध्यान और लक्ष्य-निर्देशित निर्णय लेने के नियंत्रण के लिए जिम्मेदार हैं और बाद में  ग्रे पदार्थ को कम करते हैं। बाएं हिप्पोकैम्पस (स्मृति) और दाएं थैलेमस ने भी बुद्धिमत्ता वाले धूसर द्रव्य (ग्रे मैटर) की मात्रा में वृद्धि दिखाई। शोधकर्ताओं की टीम ने ध्यान कर रहे लोगों में पहले की तुलना में बेहतर ध्यान केन्द्रित कर सकने की ओर रुझान पाया ।

शोधकर्ताओं के अनुसार, हल्की संज्ञानात्मक हानि (एमसीआई) और अल्जाइमर रोग में ध्यान अनुसंधान अभी भी शैशवावस्था के स्तर पर है। इससे पहले के शोधकर्ताओं ने ध्यान को शारीरिक मुद्राओं, आंदोलनों, मंत्रों, क्रियाओं या अन्य मष्तिष्क उपयोग प्रथाओं के साथ जोड़ा। गृह घर में ध्यान अभ्यास आमतौर पर 8-12 सप्ताह तक चलता है। जिन अध्ययनों में यह अधिक समय तक बढ़ा, उनमें मस्तिष्क परिवर्तन शामिल नहीं थे। यह एमसीआई और अल्जाइमर रोग में मस्तिष्क में होने वाले पहले परिवर्तनों में से एक है, जो लंबे समय तक प्रतिदिन अभ्यास किए जाने वाले मौन रहकर एवं अकेले बैठे ध्यान के प्रभावों की पड़ताल करता है। यह तकनीक सामान्य रूप से नियमित ध्यान करने वालों द्वारा अभ्यास की जाने वाली तकनीकों के समान है, फिर भी एक रोगी को प्रारंभिक स्मृति ह्रास के साथ प्रशिक्षित करने के लिए यह पर्याप्त रूप से सरल है ।

डॉ अमिताभ घोष ने इस पूरी प्रक्रिया को विश्लेषित करते हुए बताया है कि "हमारी जाग्रत अवस्था का अधिकांश भाग अक्सर मन को भटकाने में व्यतीत होता है। अत्यधिक मन का भटकना, खासकर जब लगातार मन नकारात्मक विचारों से भरा हुआ हो तब वह मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाता है, जिससे व्यक्ति जल्दी बूढ़ा हो जाता है या अल्जाइमर से ग्रसित हो जाता है। ऐसे में ध्यान प्रकट होने वाले विचारों के बारे में गैर-निर्णयात्मक और गैर-प्रतिक्रियाशील जागरूकता सिखाता है और इच्छित लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में सुधार करता है। ऐसा करने से, ध्यान मस्तिष्क नेटवर्क के एक समूह को सक्रिय करता है जो ध्यान और लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार को बढ़ाने के लिए समन्वय करता है, और मन भटकने और भावनात्मक प्रतिक्रिया को कम करता है"।

यह शोध बताता है कि ध्यान अभ्यास पर प्रतिदिन थोड़ा समय बिताना स्मृति हानि वाले रोगियों में सुरक्षात्मक हो सकता है। यह संभव है कि जितनी जल्दी ध्यान का अभ्यास शुरू किया जाए, परिणाम उतने ही बेहतर होंगे। टीम की योजना इस काम पर अधिक प्रतिभागियों की संख्या और अध्ययन की लंबी अवधि के साथ अनुवर्ती कार्रवाई करने की है ।

अधिक जानकारी के लिए अमिताभ घोष (amitabhaghosh269@gmail.com) से संपर्क किया जा सकता है।

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PIB Release

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